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शनिवार, 18 जून 2016

अपरिपक्वता

Aparipakvata in Hindi

हमने बच्चों को अक्सर खेलते हुए देखा होगा। कितनी ऊर्जा होती है उनके भीतर ! दिनभर हँसते  मुस्कुराते रहते है। उनके नन्हे कदम दिन-रात दौड़ते रहते हैं,फिर भी नहीं थकते। बच्चों के चेहरे देखकर ऐसा लगता है, जैसे ईश्वर ने उन्हें सारी खुशियाँ दे दी हैं। वो कितनी सुकून भरी जिंदगी जीते हैं ! बच्चों के वह खेल -खिलौने, वह बोतलों के ढक्क्न ,वह माचिस की डिबिया ,वो नन्हे बर्तनों का पिटारा ,छोटी सी कार जिसमें दुनियाँ की सैर करते रहते हैं। बच्चों का जीवन भी क्या जीवन होता है ! हर कार्य को करने का कितना उत्साह भरा होता है उनमें !  पर ये ऊर्जा बड़े हो जाने पर कहाँ  खो जाती है ? 

हमने नन्हे बच्चे को देखा होगा,  जो अपने पराये का भेद नहीं जानते। जरा सा किसी का इशारा क्या मिला, खिलखिला कर हँस देते हैं। वो मासूम मुस्कराहट ऊँच -नीच ,गरीबी -अमीरी ,अपने -पराये से कितनी अछूती है। और हम बड़े जब भी किसी से बात करते हैं, तो हम हमारे मन में मंथन करते रहतें हैं कि वह कैसा है ? हमारा क्या लगता है ? उसका स्टेटस कैसा है ? वगैरा -वगैरा। 

बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

नन्ही आँखों के सपनें

Nanhi Aankhon Ke Sapne


जब हम छोटे होते है, तो हम सभी के मन में कुछ बड़ा कर दिखाने के सपने होतें है। मुझे याद है, जब मैं विद्यालय की शिक्षिका थी, जिसमे नन्हे -नन्हे बच्चे पढ़ते थे, वहां उन  बच्चों से सवाल करने पर ,इन्ही बच्चों में कोई डॉक्टर,तो कोई इंजिनियर, कोई साइंटिस्ट,कोई पुलिस  बनना चाहता था।  वो नन्हे बच्चे सपने देख सकते है, क्योकि उन्हें वास्तविक दुनिया का ज्ञान नहीं होता ,कि बड़ा होना तो आसान है मगर नाम कमाना बहुत ही मुश्किल। 

हमारे देश में शिक्षा का स्तर को बहुत ही ऊँचा  हो गया है, मगर उस शिक्षा को हासिल  कर लेने के बाद काबिल हुए नवयुवक और नवयुवतिओं को उनके लायक कोई  स्थान नहीं मिल पाता। न जाने कितने काबिल और पढ़े लिखे लोग हैं ,जिनको उनकी काबीलियत का स्थान नहीं मिल पाने की वजह से वे बेरोज़गार घूम रहे हैं। लोग वेल एजुकेटेड  होकर दुकान पर बैठने को मजबूर हैं , खुद का व्यवसाय मजबूरी में करते हैं।  

शनिवार, 13 फ़रवरी 2016

बचपन..

BACHPAN



बचपन ! एक ऐसा शब्द है, जिसकी कल्पना मात्र से ही हर व्यक्ति के होंठों पर पर एक मुस्कान सी आ जाती है और वो मीठी यांदें ताजा हो जाती है ,जिनको हमने उन छड़ो में जिया है। हमारी माँ की हाथों की बनी मिठाईओं को, कभी माँ से  बिना बताये ले लेना ,पापा के दिए सिक्कों से मन चाही मीठी गोलिओं को खरीदना  ,बहन की चुटिया खींचनी हो या भाई के कलर पेंसिल को बिना बताये इस्तेमाल करना। वो झगड़े,रोना -रुलाना ,रूठना फिर मानना। वो नानी के घर माँ  साथ जाना और वहां के गावों में घूमना। कभी मामा  के गाड़ी की पहिये से हवा निकाल  देना। कभी मामी के बिंदी को लगा कर माँ जैसी बनाने की चाहत भुलाये नही भूलती। 

मगर आज हम उम्र के उस पड़ाव  में है, जब हमें जीवन के इस भागम-भाग भरे सफर में फुर्सत ही नही है कि  उन लोगों के बारें  में पूछें जो  कभी हमारे जीने की  वजह थे, हमारे होठों  सच्ची खुशी थे। माँ के उन पराठों का जायका हमारे पिज्जा ,बर्गर में कहाँ है। खीर क्या फ्रूट सैलट का  मजा दे सकता  है।  हमने खुद को मॉडर्न   बना लिया है ,पर  हम उन दिनों को क्या वापस ला  सकते है। मुझे  याद है जब माँ  के साथ नानी के घर जाती थी ,वहां  हमें मन पसंद की चीजे  को मिलती थी। खूब घूमना फिरना ,बे रोक -टोक कहीं  भी जाना ,दिन भर मौज मस्ती करना बहुत भाता था। मांमा  की सुनाई तोते की कहानी ,मामी जी के हाथ के  कचोरी समोसे कभी भुलाये नहीं भूलते। नानी के हाथों की सर की मालिश जैसी उन यादों की एक अलग ही छाप दिलों दिमाग में छा गई है। 

सुनो सुनो सुनो ....
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