सोमवार, 14 मार्च 2016

काश !

Kaash in Hindi

कुछ घटनायें हमारे सामने ऐसी भी आ जाती हैं ,जिनपर भरोसा  करना बहुत ही मुश्किल हो जाता है। जो हमें ये सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि क्या इंसान भी ऐसे हो सकते हैं ?  ईश्वर की सबसे सुन्दर रचना का प्रतिरूप है मानव। मगर हममें से ही कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनकी मानसिकता के बारे में बताया जाय तो विश्वास करना मुश्किल होगा। आज जो कुछ मैं  आपके समक्ष रख रहीं हूँ ,ये कोई कहानी नहीं है, ये मेरी आँखों देखी मर्मास्पद  वास्तविक घटना है, जो  मेरे हृदय को भीतर तक छलनी कर देती है। 

'माँ' एक ऐसा शब्द है ,जिसके नाम में ही पूरी दुनिया समाहित है। एक बच्चे के लिए माँ ही उसकी आदर्श होती है। आज मैं किसी माँ की  भावनाओं को आहत नहीं करना चाहती हूँ , किँतु इस पोस्ट से किसी के दिल को ठेस पहुंचे तो माफ़ करियेगा। आज मैं एक ऐसी माँ के बारे में बताउंगी, जिसके बारे में  न आपने पहले कभी सुना होगा, न ही देखा होगा। 

बात उन दिनों की है  जब मैं और मेरी बहन स्कूल में पढ़ते थे ,मैं हाईस्कूल में और मेरी बहन 11 वी में थी।  बहन की दो सहेलियाँ थीं-साधना और दीपमाला। साधना काफी शांत स्वभाव की थी और दीपमाला चुलबुली थी, जहाँ भी वो बैठती थी, वहॉँ का वातावरण खुशनुमा हो जाता था।सोमवार से  हमारी एक्सट्रा क्लास चल रही थी। हम सभी स्कूल जब पहुंचे तो देखा कि दीपमाला दी नहीं आई हैं।  मेरी बहन ने इंटरवल में पड़ोस में रहने वाली सिखा से पूछा तो  उसने बताया कि पापा की तबियत  बहुत ख़राब है, लखनऊ गई है। एक दिन के बाद दीपमाला दी  स्कूल आई, मगर  रुआंसा सी  लग रही थी।  हमने  पूछा तो  बोलीं अब वह  नहीं पढ़ेंगी। वजह पूछा गया तो वह रोने लगीं, फिर जो उन्होंने हमें बताया हम सभी सुन कर बहुत हैरान हुए। 

उन्होंने बताया कि " उनके पापा की ड्रिंक करने की आदत थी, जिसकी वजह से उनकी दोनों किडनियां ख़राब हो गई थी। डॉक्टर ने उनको 15 दिन का समय दिया था कि एक किडनी की व्यवस्था अगर कही से हो जाय  तो पापा की जान बचाई जा सकती है। माँ ने कहा कि मेरी दोनों किडनियां  निकल कर लगा दीजिये, मगर मेरे पति पति को बचा लीजिये। माँ के ब्लड की जाँच हुई, मगर ब्लड मैच नहीं हुआ। डॉक्टर ने उनकी किडनी लगाने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि माता या पिता का ब्लड ग्रुप मैच हो सकता है।  दादा जी तो मेरे  थे नहीं ,सो डॉक्टरों ने  दादी का ब्लड ग्रुप को चेक किया, जो मैच हो ही गया। सभी लोग खुश हो गए, मगर दादी ना जाने फिर किसी को बिना बताये चाचा जी  साथ  घर चली गईं। माँ ने दादीजी को कितना समझाया, मगर दादीजी अपनी किडनी देने को राजी नहीं हुई। डॉक्टर ने हमें बताया था कि अगर शरीर में एक किडनी हो तो भी जीवन जिया जा सकता है। हमारे शरीर में दो किडनियां होतीं हैं। मेरी माँ ने दादीजी  बहुत समझाने  की कोशिश की , पर  दादीजी नहीं मानी।  उन्होंने  मना कर दिया। वो बोली कि "मैं जीते जी अपनी मौत नहीं खरीद सकती।" फिर कहीं आशा की किरण नहीं दिखी तो डॉक्टर ने पापा को एक सप्ताह वेंटिलेटर पर रखने के बाद  रेफर कर दिया।  रास्ते में ही पापा का देहांत हो गया। अगर दादी चाहती तो आज पापा का हाथ हमारे सर पर होता। काश ! दादीजी मान जाती, तो आज मेरे पापा जिन्दा होते। ".और ऐसा कहकर वह फूट -फूट कर रोने लगी। 

आज भी इस  घटना की स्मृतियाँ मेरी मनः स्थिति  को पीड़ा देती है। कोई माँ ऐसा कैसे कर सकती है ? जिस माँ ने जन्म दिया, वह माँ अपने कलेजे के टुकड़े को मौत के दरवाजे पर धक्का कैसे दे सकती है ? शायद यही कलयुग है, जिसका जिक्र अक्सर माँ किया करतीं थीं, जहाँ सब सम्भव है। मैं उसकी दादी से एक बार पूछना चाहती थी कि वो कैसे ऐसा कर सकीं ? अपनी बहू को सफ़ेद साडी में देख कर उनका कलेजा फट नहीं गया। काश ! अंकल की माँ आप ना होती, तो आज वो जीवित होतें। दीपमाला दी, उनके भाई बहन और उनकी माँ आज जीवन की मुश्किलों से न  घिरते। उन बच्चों की पढ़ाई नहीं छूटती और आपको माँ कह कर अंकल भी खुद को भाग्यशाली  समझ पाते।  वाह ! क्या माँ है ? कैसी माँ है आप ? 

Image-Google  

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