रविवार, 6 मार्च 2016

नई सोच की सुबह

हेलो फ्रेंड्स ! मैं ब्लॉगअड्डा साइट पर एरियल #ShareTheLoad  कैंपेन को सपोर्ट कर  रही हूँ , जिसका उद्देश्य है -हमें उन पूर्वाग्रहों से मुक्त होना है जो की प्रायः हमारे घर में दिखते  हैं और जिन्हें हम एक जेनेरेशन से दुसरे जेनेरेशन को शिफ्ट करते हैं, जैसे कि घर के घरेलू काम-काज (I am joining the Ariel #ShareTheLoad campaign at BlogAdda and blogging about the prejudice related to household chores being passed on to the next generation.) इस सन्दर्भ में मेरे अनुभव व् विचार कुछ इस प्रकार हैं। ... 

हम सभी ने अपने माता-पिता को घर के कार्यों को पूर्ण जिम्मेदारी के साथ करते हुए देखा होगा।  हमनें अपने पिता  को अक्सर माँ से कहते हुए यह भी देखा होगा कि," तुम अपना काम ठीक से किया करो।शर्ट में दाग लगा है, जो तुमने ठीक से धोये नहीं। " और माँ से भी सुना होगा जो पिता जी को हमेशा बिज़नेस अच्छा न चलने के कारण कहती हैं,"आप घर में खर्च कम दे रहे हैं। बच्चों और परिवार की गृहस्थी का भरण-पोषण करना आपकी जिम्मेदारी है।" हम भी शादी होने के बाद उन संस्कारों को जाने-अनजाने ग्रहण कर लेते हैं और पति से बाहर  जा कर कमाने को उनका काम समझते हैं। जबकि हमारे पति घर के कार्यों का उत्तरदायित्व हमें सँभालने को कहते हैं। मगर क्या हम पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने बच्चों के रगो में यही संस्कार खून की तरह नहीं दौड़ा रहे हैं ?

एक दिन मेरे बेटे ने अपनी बहिन से कहा ,"शादी के बाद तुम्हें भी यही सब करना है। मम्मी की मदद कर उनके कार्यों को सीखा करो। " मुझे अपने बेटे की बातों पर हँसी आई। मैंने उसे समझाया,"बेटा ! -गृहस्थी एक गाड़ी के  समान होती है, जिसका एक पहिया तुम्हारे पापा और दूसरा मैं हूँ। कोई एक पहिया निकाल  दिया जाये तो क्या गाड़ी चल सकती है ? परिवार में कोई कार्य किसी एक की जिम्मेदारी नहीं होती। जो कार्य हम ख़ुशी से अच्छी तरह कर सकते हैं , वही कार्य हमें करना चाहिए। घर के कार्यों को क्या पापा ठीक प्रकार से कर सकेंगे ? नहीं न , और क्या मैं तुम्हारे पापा की तरह मजबूती से परिवार की सुरक्षा और घर के दायित्वों का भार ख़ुशी से वहन कर सकती हूँ  ? नहीं।  फिर भी जब मैं बीमार होती हूँ या कुछ करने में असमर्थ होती हूँ तो घर का कार्य करने में तुम्हारे पापा ही मेरी मदद करते हैं। मैं भी पढ़ी-लिखी हूँ। घर-गृहस्थी में पैसे कमाकर तुम्हारे पापा का हाथ बटा सकती हूँ , पर उन्होंने मुझे यह अवसर ही नहीं दिया। वो अपने दायित्वों को बखूबी निभाते हैं।  "

उसी दिन से मेरे बेटे की सोच बदल गयी और वह लड़का होने का अब दम नहीं भरता और घर की जिम्मेदारियों को बखूबी निभाता है-चाहे वो घर का काम हो या फिर बाहर का। 

साथ में, मैं एक वीडियो भी आपको दिखाना चाहती हूँ , जो एक पिता का दर्द बताता है जब वह केवल अपनी बेटी को घर की जिम्मेदारियों , जैसे घर के कपडे धोना इत्यादि ,को अकेले करते हुए देखता है।  इसे जरूर देखें और इससे प्रेरणा लें । 


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